शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग में ओणम उत्सव का आयोजन

 

हर्षोल्लास का उत्सव पर्व 'ओणम'






केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग द्वारा 20 अगस्त, 2026 को विभाग में केरल के प्रमुख सांस्कृतिक एवं पारंपरिक पर्व ओणम का उत्सव हर्षोल्लास एवं उत्साह के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में विभाग के शिक्षकगण एवं छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की और इस अवसर को सांस्कृतिक विविधता एवं आपसी सौहार्द का उत्सव बनाया।

कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. तारु एस. पवार, विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रोफेसर डॉ. मनु, सहायक आचार्य  डॉ. सीमा चंद्रन, डॉ. सुप्रिया पी. एवं डॉ. धर्मेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. राम विनोद रे तथा अतिथि अध्यापक डॉ. धनराज व सभी शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी आचार्यों ने बारी-बारी से उपस्थित सभी लोगों को ओणम पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं तथा पर्व के महत्व और सांस्कृतिक विशेषताओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर प्रोफेसर डॉ. मनु ने ओणम पर्व से जुड़े अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि बचपन में वे किस प्रकार ओणम का पर्व मनाया करते थे और समय के साथ इस पर्व को मनाने की परंपराओं में किस प्रकार परिवर्तन आया है। उन्होंने ओणम से जुड़े पारंपरिक गीतों को भी याद किया और उनमें से कुछ गीत विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किए। उनके संस्मरणों और गीतों ने कार्यक्रम में विशेष आत्मीयता और सांस्कृतिक रंग भर दिया।

कार्यक्रम का संचालन कर रही छात्रा मैत्री एन. ने आचार्यों के लिए विभिन्न मनोरंजक खेलों का आयोजन किया। सभी आचार्यों ने इन खेलों में उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपनी सक्रिय सहभागिता से कार्यक्रम को मनोरंजक बनाया। इसके पश्चात विद्यार्थियों ने भी विभिन्न खेलों एवं मनोरंजक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनकी सहभागिता से कार्यक्रम में उल्लास, उत्साह और सामूहिकता का वातावरण बना रहा।

ओणम उत्सव के समापन से पूर्व सभी के लिए केरल के पारंपरिक भोजन ‘सद्यया’ की व्यवस्था की गई। ओणम के विशेष अवसर पर तैयार किए जाने वाले इस पारंपरिक भोज का सभी शिक्षकगण एवं विद्यार्थियों ने आनंदपूर्वक स्वाद लिया। सद्यया ने कार्यक्रम को केरल की समृद्ध लोक-संस्कृति एवं खान-पान की परंपरा से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

अंततः सभी की सहभागिता और उत्साह के साथ ओणम उत्सव का सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह आयोजन न केवल एक पर्व का उत्सव था, बल्कि केरल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, लोक-स्मृतियों, सामूहिकता और आपसी सौहार्द को समझने तथा अनुभव करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी रहा।


रिपोर्ट लेखन - मान सिंह, शोधार्थी 



























शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

'नई राह - फ्रेशर डे 2026'

 नई राह 

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग द्वारा 4 अगस्त 2026, मंगलवार को सिंधु ब्लॉक स्थित सेमिनार हॉल में प्रातः 10:30 बजे 'नई राह-फ्रेशर्स डे 2026' शीर्षक से नवागंतुक विद्यार्थियों के स्वागत हेतु एक भव्य फ्रेशर पार्टी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभाग के सभी आचार्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी  उपस्थित रहे। 

विभागाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) तारु एस पवार, पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) मनु सहायक आचार्या डॉ. सीमा चंद्रन, डॉ. राम बिनोद रे, डॉ.धर्मेन्द्र प्रताप सिंह तथा डॉ. सुप्रिया पी. ने अपने-अपने वक्तव्य में नवागंतुकों को हार्दिक शुभकामनाएं  दीं और उन्हें विभागीय परिवार का हिस्सा बनने पर बधाई दी। 

कार्यक्रम में मनोरंजन के विविध आयोजन भी हुए, जिनमें खेल-प्रतियोगिताओं में सभी विद्यार्थियों और विशेष रूप से नवागंतुकों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। गायन और नृत्य के कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें शोधार्थियों की भी सक्रिय भागीदारी रही। वरिष्ठ आचार्य प्रो.(डॉ.) मनु, सहायक आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह तथा  अतिथि शिक्षक डॉ. धन राज ने भी विद्यार्थियों के साथ खेलों में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया, जिससे पूरे माहौल में आत्मीयता और उल्लास का संचार हुआ। 

इस सम्पूर्ण कार्यक्रम का सफल आयोजन स्नातकोत्तर द्वितीय वर्ष के छत्रों द्वारा किया गया, जबकि कार्यक्रम का कुशल संचालन छात्रा नन्दिता ने किया। 'नई राह' थीम के अनुरूप यह फ्रेशर पार्टी नवागंतुकों के लिए सपनों, अवसरों और साथ की के नई राह की शुरुआत का प्रतीक बनी, जिसने विभाग में आपसी सद्भाव और सामूहिकता की भावना को और सुदृढ़ किया। 


रिपोर्ट लेखन - प्रदुन कुमार, शोधार्थी   







 

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम

 

प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम



 

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग द्वारा 31 जुलाई, 2026 को प्रेमचंद की 146 वीं जयंती मनाई गई। प्रेमचंद जयंती के इस पावन साहित्यिक उपलक्ष्य पर विभाग ने विशेष व्याख्यान का आयोजन किया, जिसका शीर्षक “समकालीन विमर्श का वैचारिक परिप्रेक्ष्य और प्रेमचंद का साहित्य” था।


 

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) तारु एस. पवार ने विशेष व्याख्यान की विधिवत शुरुआत की। इस विशेष व्याख्यान के मंच का संचालन शोधार्थी मान सिंह ने किया। कार्यक्रम के संयोजक, विभाग के  सहायक आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने स्वागत अभिभाषण द्वारा विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. (डॉ.) मनु, राजभाषा अधिकारी डॉ. अनीश कुमार टी. के. एवं मुख्य अतिथि, बीज वक्ता प्रो. (डॉ.) ज़ाकिर हुसैन गुलगुंदी (हिन्दी विभाग, कर्नाटक महाविद्यालय), विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुप्रिया पी. का स्वागत किया। स्वागत वक्तव्य के दरमियान डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने प्रेमचंद की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि “जिन समस्याओं को उठाकर प्रेमचंद साहित्य में सर्वाधिक प्रासांगिक हुए, एक समयान्तर के पश्चात् उन पर विचार-विमर्श भी हुआ है।” उन्होंने तुलसीदास, प्रेमचंद के साहित्यिक सामाजिक स्वीकार्यता एवं साहित्यिक सामाजिक आलोचनात्मकता की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। 


 

इसके उपरांत ‘हिन्दी परिषद्’ के तहत आयोजित भाषण प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार वितरण किया गया। विभाग के परास्नातक प्रथम वर्ष के छात्रों ने प्रेमचंद के ऊपर अपने विचार प्रस्तुत किए थे, जिनके विजेताओं को प्रेमचंद के कहानियों का सचित्र पुस्तक एवं प्रमाणपत्र प्रदान किया गाया।  

हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो. (डॉ.) मनु ने आशीर्वचन देते हुए कथा सम्राट की रचना में लयात्मकता की बात की। उन्होंने कहा “जिस प्रकार कोई बच्चा साहिल पर खड़े होकर सागर को देखता है, ठीक उसी प्रकार प्रेमचंद मेरे लिए है।” प्रेमचंद उनके लिए कथा सम्राट से अधिक एक कवि के रूप में खुलते हैं। राजभाषा अधिकारी डॉ. अनीश कुमार टी. के. ने अपने वक्तव्य के द्वारा प्रेमचंद की महत्ता पर प्रकाश डाला।

 





 

इस विशेष व्याख्यान के बीज वक्ता  प्रो. (डॉ.) ज़ाकिर हुसैन गुलगुंदी द्वारा दिए गए व्याख्यान अतिमहत्वपूर्ण एवं सारगर्भित रहे। उनका पूरा व्याख्यान मुख्य रूप से दो हिस्सों में विभाजित था। एक हिस्सा प्रेमचंद के सम्पूर्ण रचना विधान से जुड़ा हुआ था। उनके प्रथम रचना से लेकर आखिरी रचना तक, उनकी भाषा शैली, कथानक और पात्र पर केंद्रित था। इनका दूसरा भाग प्रेमचंद की रचना में मौजूद विमर्श से जुड़ा हुआ था। गाँधी के प्रभाव, स्वाधीनता आंदोलन, समाज और परिवार के मध्य की विभाजक रेखा और समन्वय की बात, आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद, साहित्य एवं राजनीति के आलोक में विस्तृत बात की। किसान और स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर प्रेमचंद को देखने की एक नई पृष्ठभूमि बीज वक्ता ने प्रस्तुत की। उन्होंने प्रेमचंद की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि “दक्षिण भारत में जितने भी लोगों ने हिन्दी को जाना, वह प्रेमचंद के माध्यम से ही जाना।”

 


 

अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) तारु एस. पवार ने प्रेमचंद की दृष्टि और साहित्य में मौजूद संस्कार-सभ्यता-संस्कृति और शोषण के तौर-तरीके पर बात रखी। साथ ही, रूपनारायण सोनकर के ‘सूअर दान’, ‘होरी जहाँ भी है’ जैसी रचनाओं के समतुल्य प्रेमचंद को देखने की बात कही।

 

इसके उपरांत प्रश्नोत्तरी का दौर चला। विभाग के शोधार्थियों ने अपनी जिज्ञासा को गणमान्य मंच के सामने रखा। प्रश्न रखने वालों शोधार्थियों में मान सिंह, मूलचंद कन्नौजिया, इलियास मोहम्मद, प्रियंका बी. जवंजाल और आदित्य प्रमुख रहा। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विभाग के शोधार्थी मनोज बिस्वास ने किया। परास्नातक द्वितीय वर्ष के छात्रों के विशेष सहयोग हेतु, छात्रों को विशेष आभार प्रदान किया गया।



 









 


घनश्याम कुमार

शोधार्थी, हिन्दी विभाग

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय  

 

   

              

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग में ओणम उत्सव का आयोजन

  हर्षोल्लास  का उत्सव  पर्व  ' ओणम' केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग द्वारा 20 अगस्त, 2026 को वि...