मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम

 

प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम



 

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग द्वारा 31 जुलाई, 2026 को प्रेमचंद की 146 वीं जयंती मनाई गई। प्रेमचंद जयंती के इस पावन साहित्यिक उपलक्ष्य पर विभाग ने विशेष व्याख्यान का आयोजन किया, जिसका शीर्षक “समकालीन विमर्श का वैचारिक परिप्रेक्ष्य और प्रेमचंद का साहित्य” था।


 

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) तारु एस. पवार ने विशेष व्याख्यान की विधिवत शुरुआत की। इस विशेष व्याख्यान के मंच का संचालन शोधार्थी मान सिंह ने किया। कार्यक्रम के संयोजक, विभाग के  सहायक आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने स्वागत अभिभाषण द्वारा विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. (डॉ.) मनु, राजभाषा अधिकारी डॉ. अनीश कुमार टी. के. एवं मुख्य अतिथि, बीज वक्ता प्रो. (डॉ.) ज़ाकिर हुसैन गुलगुंदी (हिन्दी विभाग, कर्नाटक महाविद्यालय), विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुप्रिया पी. का स्वागत किया। स्वागत वक्तव्य के दरमियान डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने प्रेमचंद की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि “जिन समस्याओं को उठाकर प्रेमचंद साहित्य में सर्वाधिक प्रासांगिक हुए, एक समयान्तर के पश्चात् उन पर विचार-विमर्श भी हुआ है।” उन्होंने तुलसीदास, प्रेमचंद के साहित्यिक सामाजिक स्वीकार्यता एवं साहित्यिक सामाजिक आलोचनात्मकता की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। 


 

इसके उपरांत ‘हिन्दी परिषद्’ के तहत आयोजित भाषण प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार वितरण किया गया। विभाग के परास्नातक प्रथम वर्ष के छात्रों ने प्रेमचंद के ऊपर अपने विचार प्रस्तुत किए थे, जिनके विजेताओं को प्रेमचंद के कहानियों का सचित्र पुस्तक एवं प्रमाणपत्र प्रदान किया गाया।  

हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो. (डॉ.) मनु ने आशीर्वचन देते हुए कथा सम्राट की रचना में लयात्मकता की बात की। उन्होंने कहा “जिस प्रकार कोई बच्चा साहिल पर खड़े होकर सागर को देखता है, ठीक उसी प्रकार प्रेमचंद मेरे लिए है।” प्रेमचंद उनके लिए कथा सम्राट से अधिक एक कवि के रूप में खुलते हैं। राजभाषा अधिकारी डॉ. अनीश कुमार टी. के. ने अपने वक्तव्य के द्वारा प्रेमचंद की महत्ता पर प्रकाश डाला।

 





 

इस विशेष व्याख्यान के बीज वक्ता  प्रो. (डॉ.) ज़ाकिर हुसैन गुलगुंदी द्वारा दिए गए व्याख्यान अतिमहत्वपूर्ण एवं सारगर्भित रहे। उनका पूरा व्याख्यान मुख्य रूप से दो हिस्सों में विभाजित था। एक हिस्सा प्रेमचंद के सम्पूर्ण रचना विधान से जुड़ा हुआ था। उनके प्रथम रचना से लेकर आखिरी रचना तक, उनकी भाषा शैली, कथानक और पात्र पर केंद्रित था। इनका दूसरा भाग प्रेमचंद की रचना में मौजूद विमर्श से जुड़ा हुआ था। गाँधी के प्रभाव, स्वाधीनता आंदोलन, समाज और परिवार के मध्य की विभाजक रेखा और समन्वय की बात, आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद, साहित्य एवं राजनीति के आलोक में विस्तृत बात की। किसान और स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर प्रेमचंद को देखने की एक नई पृष्ठभूमि बीज वक्ता ने प्रस्तुत की। उन्होंने प्रेमचंद की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि “दक्षिण भारत में जितने भी लोगों ने हिन्दी को जाना, वह प्रेमचंद के माध्यम से ही जाना।”

 


 

अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) तारु एस. पवार ने प्रेमचंद की दृष्टि और साहित्य में मौजूद संस्कार-सभ्यता-संस्कृति और शोषण के तौर-तरीके पर बात रखी। साथ ही, रूपनारायण सोनकर के ‘सूअर दान’, ‘होरी जहाँ भी है’ जैसी रचनाओं के समतुल्य प्रेमचंद को देखने की बात कही।

 

इसके उपरांत प्रश्नोत्तरी का दौर चला। विभाग के शोधार्थियों ने अपनी जिज्ञासा को गणमान्य मंच के सामने रखा। प्रश्न रखने वालों शोधार्थियों में मान सिंह, मूलचंद कन्नौजिया, इलियास मोहम्मद, प्रियंका बी. जवंजाल और आदित्य प्रमुख रहा। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विभाग के शोधार्थी मनोज बिस्वास ने किया। परास्नातक द्वितीय वर्ष के छात्रों के विशेष सहयोग हेतु, छात्रों को विशेष आभार प्रदान किया गया।



 









 


घनश्याम कुमार

शोधार्थी, हिन्दी विभाग

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय  

 

   

              

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