शोध प्रबंध की खुली मौखिक प्रस्तुति
आज दिनांक 09 जुलाई 2026, गुरुवार को प्रातः 11 बजे, हिन्दी विभाग केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी श्री धनराज (पंजीकरण संख्या: LHC072101) के शोध प्रबंध ‘इक्कीसवीं शताब्दी के प्रमुख हिन्दी उपन्यासों में अभिव्यक्त किसान विमर्श’ की खुली मौखिक प्रस्तुति का आयोजन मिश्रित रूप (हाइब्रिड मोड) में विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में किया गया। आयोजन में उनके शोध निर्देशक हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. राम बिनोद रे प्रत्यक्ष तौर पर उपस्थित रहे।
इस अवसर पर प्रस्तुत मौखिकी के अध्यक्ष के रूप में केरल के कालीकट विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग से वरिष्ठ आचार्य प्रो. (डॉ.) प्रमोद कोवप्रथ आभासी पटल पर मौजूद रहे। इसके साथ ही विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) तारु एस पवार (अप्रत्यक्ष रूप से), पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ मनु , सहायक आचार्या डॉ. सीमा चंद्रन, सहायक आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह एवं सहायक आचार्या डॉ. सुप्रिया पी उपस्थित रही हैं।
मौखिकी का आरम्भ सर्वप्रथम शोध निर्देशक के रूप में उपस्थित सहायक आचार्य डॉ. राम बिनोद रे के द्वारा भारत और किसान से संबंधित कुछ विचारों को सांझा कर आदरणीय अध्यक्ष महोदय के परिचय का वाचन कर उनके सत्कार के साथ हुआ।
अगले क्रम में अध्यक्ष की अनुमति के पश्चात शोधार्थी की प्रस्तुति शुरू हुई जिसमें उन्होंने क्रमानुसार शीर्षक परिचय, उद्देश्य, अध्याय विभाजन और निष्कर्ष को भली भाँति अभिव्यक्त किया। अपने शोध निष्कर्ष के रूप में उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यासों में किसान केवल कृषि उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का केन्द्रीय पात्र है, साहित्य कृषि नीतियों और सामाजिक चेतना के मध्य संवाद स्थापित करने का प्रभावी माध्यम रहा है आदि अन्य कुछ व्यक्त निष्कर्षों के साथ शोधार्थी ने अपनी प्रस्तुति को विराम दिया। तत्पश्चात खुले मंच की गरिमा बनाए रखते हुए शोध के गहन विश्लेषण एवं आकलन पर दृष्टिपात करते हुए प्रश्नों की शृंखला की शुरुआत की गयी।
सवालों के क्रम में अध्यक्ष महोदय ने अपना पहला सवाल श्री धनराज के समक्ष रखते हुए कहा कि उपन्यास में उपन्यासकारों ने जो यथार्थ प्रस्तुत किया है उससे समाज में उपस्थित यथार्थ में कैसे तालमेल या साम्य-वैषम्य देखने को मिलता है ? जिसका प्रतिउत्तर देते हुए शोधार्थी ने मुख्यतः फाँस उपन्यास की भूमि को बताते हुए एवं संजीव के फाँस को लिखते समय किसानों की समस्या को समझने के प्रयास को बताया। अध्यक्ष के द्वारा किए गए अगले सवाल जिसमें उन्होंने उपन्यास में किसान समस्या में कल्पना और यथार्थ से जुड़ा प्रश्न पूछा इसके अतिरिक्त भी अन्य चार सवाल उनके द्वारा किए गए जिसका अपने विवेकी दृष्टिकोण से उत्तर देते हुए शोधार्थी ने अपनी भूमिका का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन किया।
शृंखला के बढ़ते कदम में शोधार्थियों ने भी कुछ गहन सवाल और सुझाव दिए इसके पश्चात हिन्दी विभाग के प्रो.(डॉ) मनु ने भी किसान जीवन को लेकर प्रश्न पूछा और कहा कि जो जीत लेता उनकी जय हम बोलतें है, हारने वाले की जय किस प्रकार देखते हैं? जिसका जवाब शोधार्थी ने किसानों के सकारात्मक आत्मबल की ओर इंगित करते हुए दिया। इस कड़ी के अंतिम पायदान की ओर अग्रसारित होते हुए परिणाम के रूप में अध्यक्ष महोदय ने शोधार्थी को बधाई देते हुए डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।
समापन की ओर बढ़ते हुए धन्यवाद ज्ञापन का जरूरी औपचारिक कार्यभार शोध निर्देशक डॉ. राम बिनोद रे के द्वारा संभाला गया। उसके पश्चात अपने शोध के दौर के अनुभव को व्यक्त करते हुए सभी सहायक जनों को शोधार्थी धन राज के द्वारा आभार प्रेषित किया गया। जीवन की इस विशेष उपलब्धि पर विभाग के समस्त आचार्यों के द्वारा उन्हें वर्तमान की बधाई एवं अग्रिम जीवन के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित की गईं।
सेफाली राय
शोधार्थी, हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग






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